शनिवार, 10 दिसंबर 2011

चित्र

चित्र बनाओ, एक जटिल चित्र

युद्ध एक राक्षस है जो खादी नहीं ओढ़ता

औरतें चट्टानों पर पीट-पीट कर कमीज़ें
धोती हैं

शाम बेदम चेहरों को नील-लोहित रंग के
रेशम से ढँक देती है

कोई संगीत को अपने सर ओढ़ के आता है
(स्कार्फ़ की तरह)
सिर्फ़ तुम्हारे लिए..

10 टिप्‍पणियां:

सदा ने कहा…

वाह ...बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति

कल 14/12/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्‍वागत है, मसीहा बनने का संस्‍कार लिए ....

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत खूब

***Punam*** ने कहा…

bahut sundar...

यशवन्त माथुर (Yashwant Mathur) ने कहा…

क्या बात है.... वाह!

सादर

anju(anu) choudhary ने कहा…

umdaa

kshama ने कहा…

Nihayat sundar!

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

बहुत खूब... वाह!
सादर...

dheerendra ने कहा…

दीपशिखा जी,..आपने बहुत सुंदर रचना लिखी-बहुत खूब ..बधाई.....

मेरी नई पोस्ट की चंद लाइनें पेश है....

जहर इन्हीं का बोया है, प्रेम-भाव परिपाटी में
घोल दिया बारूद इन्होने, हँसते गाते माटी में,
मस्ती में बौराये नेता, चमचे लगे दलाली में
रख छूरी जनता के,अफसर मस्ती के लाली में,

पूरी रचना पढ़ने के लिए काव्यान्जलि मे click करे

दीपशिखा वर्मा / DEEPSHIKHA VERMA ने कहा…

आप सभी का बहुत-बहुत शुक्रिया :)

दिगम्बर नासवा ने कहा…

वाह ... क्या बात है ... ऐसे जीवंत चित्र बनाना आसान नहीं ...

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