शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

मीना कुमारी

वो रहती थी,
वो ज़िंदा थी.
महफिलों में,
परदे पर,
गर कुछ उसकी आँखों
में चमकता तो वो
होता गम का बादल . .
मानो झूल ही रहा हो
कोर पे आके,
और अंधेरों की
तरफ इशारा करता
बोल रहा हो-
ज़रा ओट में हो लो,
बरसने को हूँ मैं !


















लिखा था कभी उन्होनें -
" न हाथ थाम सके, न पकड़ सके दामन,
  बड़े क़रीब से उठकर चला गया कोई "

2 टिप्‍पणियां:

Brijendra Singh... (बिरजू, برجو) ने कहा…

Bahut khoob..meena kumari ko is tarah kuchh alfazon mai likhna aasaan nahi..but u got it here.. keep it up. :)

दीपशिखा वर्मा / DEEPSHIKHA VERMA ने कहा…

शुक्रिया ब्रिजेन्द्र जी :)
ख़ुशी है कि थोड़ी फुर्सत आप मेरे ब्लॉग के नाम कर देते हैं.
कई दिनों से आपके ब्लॉग नहीं आई,
देखें कैसी छंटाई की है आपने :)

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