मंगलवार, 17 अगस्त 2010

चाँद का पौधा

अभी-अभी पारुल पुखराज जी के चाँद पे चढ़ते हुए कुछ अलफ़ाज़ देखे ,
देखा देखी मेरे शब्द भी मचलने लगे ..उस रोशन गोले पे चढ़ने के लिए :)





अबकी पूनम जो
चाँद उगे ,
एक कलम काट के रख
लेना .

उसे यहाँ आँगन के
बीचों बीच लगा देंगे !
और जब भी कुछ फूल
कलियों से लदेगा वो

उन्हें उस रुपहले गुलदान
में डाल दूंगी .
फिर न मुझे कुछ करना
है न तुम्हें .

अँधेरा मसलेगा उन
कलियों को रात भर,
सुबह सारा आशियां
रोशन होगा . . .

5 टिप्‍पणियां:

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

क्या बात है ..बहुत खूब ..

Parul ने कहा…

ye chand si gol nazm dil roshan kar rahi hai..lajawab hai ji :)

पारूल ने कहा…

अहा !

अमावस में रोप लेंगे बीच आँगन ...दो कलम बनाना :)

दीपशिखा वर्मा / DEEPSHIKHA VERMA ने कहा…

ज़रूर ! :)

अनूप शुक्ल ने कहा…

वाह! चांद की कलम!

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