मंगलवार, 29 जून 2010

गुलज़ार के नाम -

जल जा , जल जा
इश्क में जल जा जले सो कुंदन होए .
जलती राख लगा ले माथे 
लगे तो चन्दन होए ..

जब जब शब्द तालू से उठ
कहीं हवा में बिखर जाते हैं
चुपचाप ,बिना कोई आहट किये

तब तब तुम्हारी कविताओं पे
हाथ फेर लेती हूँ .
तब तब तुमसे मिलने चली आती हूँ .

तुम ही तो हो वो
जो उन उड़ते जंगली ख्यालों
के पंख कुतर ..
उन्हें फिर मेरे ज़हन
के पिंजरे में बैठा जाते हो .

तुम्ही तो हो
जो बुझ रही लौ
के खातिर कुछ घी -तेल के
 कनिस्तर ले आते हो . :)

3 टिप्‍पणियां:

RITAMVARA ने कहा…

saans bhi waise hi chalti hai hamesha ki tarah
aankh waise hi jhapakti hai hamesh ki tarah
thodi si bheegi huyi rehti hai aur kuch bhi nahin
tere jaane se kuch to badla nahin...

तुम्ही तो हो
जो बुझ रही लौ
के खातिर कुछ घी -तेल के
कनिस्तर ले आते हो :)

intihaa ने कहा…

गुलज़ार ~रात को उठ के बैचेनी से कहता है ,
मेरी कोख में इक नज़्म पल रही है ! :)

Rishabh Jain ने कहा…

तुम ही तो हो वो
जो उन उड़ते जंगली ख्यालों
के पंख कुतर ..
उन्हें फिर मेरे ज़हन
के पिंजरे में बैठा जाते हो .
bAHUT KHOOB |

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